AutorRTJD Incognita Island : जंगल
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🔹 प्रकृति की स्वर रचना   क्या आप कभी कीट संगीतज्ञों से मिले हैं ? यदि नहीं, तो हम आपको निशाचर कोरस के और करीब ले जाएंगे! 🔹 कीड़े क्यों गात...

कीड़े क्यों गाते हैं? How Insects Are Sing !


🔹प्रकृति की स्वर रचना 


  • क्या आप कभी कीट संगीतज्ञों से मिले हैं ? यदि नहीं, तो हम आपको निशाचर कोरस के और करीब ले जाएंगे!



🔹कीड़े क्यों गाते हैं?



कीट एक दूसरे से संवाद के साथ गाते हैं। ज्यादातर मामलों में, मादाओं का ध्यान आकर्षित करने के लिए पुरुष गायन करते हैं। वे अपना बहुत सारा समय और ऊर्जा इसमें लगाते हैं। चूंकि बहुत सारे कीड़े अपने साथियों को बुला रहे है ।


🔹समयबद्ध गायन


सिकाडास आम तौर पर दिन के उजाले में और शाम को कॉल करते हैं, रात में शांत हो जाते हैं। जबकि दिन में टिड्डों की आवाज सुनाई देती है। कई कैटीडिड्स रात में फोन करते हैं।


🔹वे कैसे गाते हैं?

1)

सिकाडस के पास एक विशेष अंग होता है जिसमें दो घुमावदार प्लेटें होती हैं जिन्हें "टिंबल्स" कहा जाता है। यह इन प्लेटों को तेज गति से अंदर और बाहर पॉप करता है, जिससे बहुत तेज आवाज पैदा होती है। प्रत्येक सिकाडा प्रजाति का अपना विशिष्ट भनभनाहट होता है।


2)

कैटीडिड अपने अग्रपंखों को आपस में रगड़ कर आवाज निकालते हैं। यह उस ध्वनि से नाम प्राप्त करता है जो यह बनाता है, यह एक तीन-नोट गीत ध्वनि है जैसे "का-टी-डीड।"



3)

झींगुरों के पिछले पैरों पर रीढ़ होती है, जिससे वे आवाज करने के लिए पेट पर एक कठोर प्लेट के खिलाफ रगड़ते हैं।



4)

टिड्डे अपने पिछले पैरों को अपने पंखों पर रगड़ कर आवाज पैदा करते हैं। कुछ प्रजातियाँ अपने पंख फड़फड़ा कर ऐसा करती हैं। वे अपने मुंह से शोर भी कर सकते हैं, जो बहुत ही शान्त चहकती आवाज है।

काजीरंगा नेशनल पार्क  राष्ट्रीय उद्यान  हर बार की तरह इस बार फिर आपके लिए भारत की ऐतिहासिक धरोहर की इस श्रेणी में एक और नेशनल पार्क पेश करते...

काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान Kaajiranga National Park


काजीरंगा नेशनल पार्क 

राष्ट्रीय उद्यान 


हर बार की तरह इस बार फिर आपके लिए भारत की ऐतिहासिक धरोहर की इस श्रेणी में एक और नेशनल पार्क पेश करते है इस बार फोकस करते हैं काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान पर-


काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान को युनेस्को ने वर्ष 1985 में विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल किया था।

भारत में पाई जाने वाली कपि की एकमात्र प्रजाति लॉक गिब्बन भी यहां पाई जाती है। साथ ही भारतीय हाथी, गौर, सांभर, स्लॉथ बियर आदि प्राणी भी देखे जा सकते हैं।


काजीरंगा नेशनल पार्क को वर्ष 1974 में भारत में असम के राष्ट्रीय उद्यान गोलाघाट और नागांव घोषित किया क्षेत्रों में स्थित है। गया था।


काजीरंगा उद्यान एक सींग वाले भारतीय गैंडों के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

मुख्य आकर्षक जानवर 


यहां बाघ भी पाए जाते हैं। साथ ही रॉयल बंगाल टाइगर्स और अफ्रीकी तेंदुए जैसी बड़ी बिल्लियों की कई प्रजातियां देखने को मिलती हैं ।

यह असम का सबसे पुराना उद्यान है, जो करीब 430 वर्ग किलोमीटर मैं फैला हुआ है।


  Stone Fish  समुद्र हमेशा से ही रहस्यों और खौफनाक जीवों का वतावरण रहा है । आज तक जितने भी भयानक जीवों के बारे में आज जो कुछ हमे पता है वो क...

पत्थर जैसी दिखने वाली मछ्ली Stone Fish

 

Stone Fish 

समुद्र हमेशा से ही रहस्यों और खौफनाक जीवों का वतावरण रहा है । आज तक जितने भी भयानक जीवों के बारे में आज जो कुछ हमे पता है वो कहीं न कहीं समुद्र से ही जुड़े होते है । चाहे वो दुनिया के सबसे बड़े जीव को लेकर हो या शार्क और ऑक्टोपस के खतरनाक कारनामे हो । मगर हम आज दुनिया के सबसे ज़हरीली मछ्ली के बारे में बात कर रहे है । जी हां , मैं स्टोन फिश ( Stone Fish) की ही बात कर रहा हूं । आपने स्टोन फिश के बारे में सुन तो बहुत होंगा मगर आज हम इसके बारे में कुछ नया जानेंगे । ये समुद्र के सबसे निचले स्तर पर पाए जाने वाली मछली है जो 30 से 40 सेंटी मीटर आकर और 250 से 450 किलो ग्राम तक के वजन के साथ पाई जाती है । इसकी कई सारी प्रजातियां होती है जिसमे कई प्रजातियां आपका मन मोह लेंगी कहने का मतलब दिखने में रंग बिरंगी होती है साथ ही बहुत ही शांत स्वभाव की भी । मगर इसके उलट इसकी कुछ प्रजातियां मानो बिल्कुल पत्थर और खुरदरी त्वचा की भद्दी दिखने वाली होती है । जिस कारण कई बार शिकार इसे पत्थर समझ कर इसके शिकंजे में फस जाते है । ये इतनी जहरीली होती है की कई बार गोताखोर भी इसके शिकार हो चुके है । स्टोन फिश जैसा की इसके नाम से पता चल रहा है ये एक लंबे समय तक एक ही जगह स्थिर रहती है जिस कारण से इसके शरीर पर कई भी उग आती है जिस वजह से अपने शिकार को गुमराह करने में और सक्षम हो जाती है । स्टोन फिश आमतोर पर छोटे छोटे जीव और मछलियां ही कहती है मगर कई बार ये इसके आकर के बड़े जीवों का भी शिकार कर जाती है । भले मानव अंतरिक्ष में जाकर ही रहने लगा है मगर आज भी धरती पर ही समुद्र को पूरी तरह से नहीं समझ सका है । हम जब भी समुद्र की बात करते है तो सबसे पहले हमें बीच और उसपर होने वाली मौज मस्ती या फिर किसी जहाज़ी बेड़े की कहानी ही याद आती है । मगर हम समुद्र के वास्तविक स्वरूप से बेखबर होते है । 



 आपने दुनिया के सबसे बड़े जीव का नाम सुना ही होगा जो  की एक " व्हेल " मछ्ली है । मगर हम आज आपको दुनिया नहीं इस पृथ्वी पर पाए जाने ...

सफेद दांतेदार पिग्मी श्रे Smallest Mammals in the earth

 आपने दुनिया के सबसे बड़े जीव का नाम सुना ही होगा जो  की एक " व्हेल " मछ्ली है । मगर हम आज आपको दुनिया नहीं इस पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे सुष्म जीव जो की एक मैमलस है उसकी बात करेंगे । इस जीव को नाम है " सफेद दांतेदार पिग्मी श्रे " यानी White toothed pygmi shrew ।

मैमल :  सफेद दांतेदार पिग्मी श्रे 


आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यह जीव मात्र 1.56 या सीधे शब्दों में कहें तो डेढ़ ग्राम का है और इसकी लम्बाई महज़ 4 सेंटी मीटर हैं । वाकई हमारी धरती अजूबों और अनूठो का गृह है । यह जीव दिखने में बिल्कुल एक चूहे के समान दिखाई देता है ।



  कोमोडो ड्रैगन कोमोडो ड्रैगन एक प्रकार की छिपकली है जो आमतोर पर इंडोनेशिया के आइलैंड्स में पाई जाती हैं । यह lizard लिजार्ड फैमिली की ही एक...

Largest and big lizard in the world

 

कोमोडो ड्रैगन

कोमोडो ड्रैगन एक प्रकार की छिपकली है जो आमतोर पर इंडोनेशिया के आइलैंड्स में पाई जाती हैं । यह lizard लिजार्ड फैमिली की ही एक प्रजाति है जो घड़ियाल जैसी ही दिखती है । यह धरती पर रेंगकर चलने वाली सबसे बड़ी छिपकली है । यह लगभग 3 मीटर लंबी और 70 किलोग्राम वजन लिए रेंगती है । 

मॉनिटर लिजार्ड प्रजाति की यह छिपकली सांप , पक्षी , मैमल्स और वो सभी छोटे जीव जो जमीनी सतह पर पाए जाते है ये उन सभी को अपना शिकार बनाती है । वैसे तो ये ज्यादा खतरनाक जीवों की श्रेणी में नहीं आती है । मगर जब ये बहुत भूखी होती है तो सामने आने वाली हर चीज से उलझ जाती है और कई भिड़त में ये सामने वाले जीव की हालत पतली कर देती है । कहा जाता हैं की कोमोडो ड्रैगन 900 फिट दूर स्थित चीजों को भी आसानी से देख लेती है और ये अपने शिकार को दूर से ही नजरे गड़ाए रहती है । आमतौर पर छिपकलियां या मॉनिटर फैमिली के जीव आलसी और धीमी गति के होते है मगर कोमोडो दिन भर में लगभग 2 किलो मीटर तक का सफर तय कर सकती है । ये वाकई में बहुत बड़ा कारनामा है क्युकी इसकी तुलना में दूसरे रेप्टाइल्स ज्यादा घूमक्कड़ नहीं होते है । 



 समुद्र में पाए जाने वाले प्राणियों में सबसे मुख्य मछलियां ही आती है । और इसलिए भी समुद्र की रानी मछली को कहा जाता है । आज तक हमने समद्र में...

बुद्धिजीव सी-लॉयन - Difference Between Seal And Sea-Lion

 समुद्र में पाए जाने वाले प्राणियों में सबसे मुख्य मछलियां ही आती है । और इसलिए भी समुद्र की रानी मछली को कहा जाता है । आज तक हमने समद्र में सिर्फ तैरने वाले जीवों से तो परिचित है मगर आज हम जमीन पर रेंगने और चलने वाले जीव के बारे में बात करेंगे । हम सब ये तो जानते है की जंगल का राजा शेर को कहा जाता है । मगर हम अब बात करने जा रहे है समुद्र के शेर के बारे में , आप जिस तरह जंगल के खूंखार शेर को जानते है ये इसके एक दम विपरीत प्राणी है । 

सी~लाईन


सील ( Seal ) , सी-लॉयन ( Sea-Lion ) और वालरस एनिमल पिनेपेड्स ( Pinnipeds ) के रूप में पाए जाते है । पिनिपेड का मतलब ऐसे जीवों से होता है जो थल और जल दोनो आवरण में चल फिर सकते है ।  सील और सी-लॉयन ( जलव्याघ्र ) में कुछ बड़े अंतर है जेसे की सी-लॉयन अपने चारो पट्टिका ( फ्लिपर्स ) का इस्तेमाल कर जमीन पर भी चल सकता है जबकि सील अपने पीछे के हिस्से का सहरा लेकर छलांग लगाकर चलता है । सी-लॉयन दिखने में भालू जैसा लगता है जबकि सील चिकनी चमड़ी वाला व्हेल जैसा दिखता है । नर सी-लॉयन का वजन लगभग 363 किलोग्राम तक होता है और उसकी ऊंचाई 9 फीट के आस पास होती है । जबकि मादा सी-लॉयन का वजन 181 किलोग्राम और ऊंचाई यही कही 6 फीट के आस पास होती है । ये इतना भरकम शरीर लेकर भी पानी में आसानी से तैर लेता है । यह 40 किलोमीटर प्रति घंटे की तेज रफ्तार से पानी को चीरता हुआ तैर लेता है । इसके कान तो होते है मगर आकर में बहुत छोटे जिस वजह से उनमें पानी नहीं घुस पाता है ।  इतना ही नहीं सी-लॉयन अपने शिकार के लिए लम्बे - लम्बे गोते भी आसानी से लगा लेता है । ये अधिकतम 900 फीट  की ऊंचाई तक गोता लगा सकता है ।  मगर ये शिकार के लिए समुद्र के अधिक गहराई में नही जाता क्योंकि वहा इनकी जान को शार्क जेसे खूंखार समुद्री जीवो से खतरा होता है । कहा जाता है बुद्धिमान जीवों की सूची में डॉल्फिन का नाम भी लिया जाता है । और हमारे जलव्याघ्र भी डॉल्फिन की तरह समझदार और चतुरता का उधारण माना जाता है । सी-लॉयन के शरीर पर बाल भी मौजूद होते है ये बाल बारीक तो होते है मगर इनकी मोटाई होने के कारण पानी में तैरने में सहयाता मिलती है । इनके चार फ्लिपर्स पानी और जमीन पर दोनो जगह काम करते है और यही विशेषता इस जीव को अन्य जीवो से अलग करती है । सी-लॉयन  का सामान्यतः गहरा भूरा रंग होता है और गोल - मोटल शरीर संरचना होती है । 



पूरे विश्व में सी-लॉयन की कुल 7 प्रजातियां पाई जाती है जिसमे से स्टेलर प्रजाती आकर में सबसे बड़ी होती है । ये पूरी दुनिया के समुद्रीय तटो पर मिल जाएंगे सिवाय उत्तरी अटलांटिक महासागर को छोड़कर । इनको ज्यादातर झुंड में देखा जासकता है क्योंकि इसको समूह में रहना पसंद है और ये सुरक्षित भी रहता है । सी-लॉयन को स्तनधारी प्राणियों की श्रेणी में रखा गया है । ये अन्य जीवो की तरह जमीन पर बच्चे देते हैं जिनका प्रारंभिक वजन 7 किलोग्राम तक होता है । इनके बच्चे चलने से पहले पानी में तैरना सीख जाता है । ये दिखने में बहुत ही मासूम और शांत स्वभाव का जीव लगता है , मगर जब इसके शिकार करने का वक्त होता है तो ये ऑक्टोपस जेसे खतरनाक समद्रीय जानवर को भी अपने शिकंजे में कर लेता है । इनका साधारण भोजन तो छोटी - छोटी मछलियां होती है मगर कभी कभार ये झुंड में हमला कर बड़े जीवो का भी शिकार कर लेते है । सी-लॉयन पानी में 20 मिनट तक अपनी सांस रोक कर तैर सकता है और खतरा महसूस होने पर यह मरने का ढोंग भी बड़ी चतुरता से कर लेता है । यह शयाना तो है ही साथ में खूंखार भी है इसलिए इसे समद्रु का शेर भी कहा जाता है । 


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 आज तक आपने कितने पक्षि देखे होंगे ? अनगिनत , जिसकी कोई गिनती नहीं है न ? चाहे वो आसमान में उड़ने वाले पक्षी हो या पालतू पक्षी या फिर जंगल औ...

पेलिकन Lambi Chonche Vaala Bird

 आज तक आपने कितने पक्षि देखे होंगे ? अनगिनत , जिसकी कोई गिनती नहीं है न ? चाहे वो आसमान में उड़ने वाले पक्षी हो या पालतू पक्षी या फिर जंगल और चिड़ियाघर वाले होंगे ! कोई पक्षी उसके मधुर आवाज से आपको मनमोहित किया होगा तो कईयो ने अपनी तेज उड़ान के कारण हैरान किया होगा या फिर किसी पक्षी की मासूमियत ने आपको पागल किया होगा । मगर आज हम जिस पक्षी की बात करने वाले है वो इन सबसे अलग और हटके है थोड़ा । जो अपनी लंबी चोंच के चलते दुनिया भर में चर्चित है । इसको आपने कई दफा दे


खा भी होंगा मगर आपको उस वक्त इसका नाम नही पता होंगा या याद नही आ रहा होंगा । मगर आज इसके बारे में पढ़ने के बाद आप इसे जहा भी देखेंगे तो समझ जायेंगे यह वही पक्षी है । यह पेलीकन ( Pelican )  पक्षी है जो बगुले और बतख का मिलता - जुलता स्वरूप है । आप इसे पानी में डुबकियां लगाते या किनारे पर गोते लगाते देख सकते है । पेलिकन कई रंगों में पाए जाते है पर सफेद और गुलाबी रंगो में इनको ज्यादातर देखा जाता है । ये आमतौर पर पानी की किनारे तिनके या मिट्टी के घोंसले बनकर रहते है । यह एक प्रवासी पक्षी है जो साइबेरिया और यूरोप से हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर भारत में आते है । पेलिकन पक्षी मुख्यताः भारत के पश्चिमी क्षेत्र में निवास करते है , गुजरात और महाराष्ट्र की सीमाओं पर इनको भरी संख्या में देखा जा सकता है । नवंबर से दिसम्बर तक इनका आगमन भारत में शुरू हो जाता है । ये हमेशा झुंड में ही रहना पसंद करते है जिस वजह से इनके घोसलो की संख्या बड़े तादाद में एक साथ होती है ।

  मादा पेलिकन 2 से 3 अंडे देती है और इनके चूजों का पालन - पोषण दोनो पक्षी मिलकर करते है । इनके घोंसले जमीन पर घास और मिट्टी में होने कारण जंगली जानवरों से खतरा बना रहता है , कई बार इनके अंडो को कुत्ते और लोमड़ी जेसे जानवर खा भी जाते है । नर पेलिकन का ओसत वजन 9 से 12  किलो ग्राम के बीच होता है इतने भारी भरकम पक्षी होने के बावजूद इनकी उड़ने की रफ्तार बहुत ही तेज होती है । इसके अलावा इन पक्षियों को समद्रीय पक्षियों में सबसे विशाल पक्षियों का दर्जा भी दिया गया है । पेलिकन पक्षियों को अक्सर साफ वातावरण में देखा गया है इसलिए इनको इतना ज्यादा लोग भी पसंद करते है । इनको भी आम मनुष्य को तरह गन्दगी और प्रदूषण बिलकुल भी पसंद नही है । पेलिकन पक्षियों का शिकार झीलों और नदियों , तालाब में रहने वाली मछलियां होती है । ये अपनी लंबी तिकोनी चोंच से पानी को चीरते हुए अपना शिकार करती है और ये नजरा देख हर कोई इस पक्षी की चतुराई की वाह - वाही करने लगता है ।

इनकी एक मुख्य विशेषता होती है , आपने रेगिस्तान के ऊट के बारे में सुना होंगा जो अपने कुब्बड़ लंबे समय तक पानी संचय करके रखता है । उसी तरह पेलिकन के गले में एक थेलीनुमा अवस्था होती है जहा ये पर्याप्त मात्रा में पानी और भोजन को संचित करके रखा लेते है और लंबे समय तक जमीन पर उतरे बिना अपना सफर जारी रखते है मगर भारत की नदियों और झीलों में बढ़ती गन्दगी और प्रदूषित जल के कारण पेलीकन पक्षियों का भारत में आवास घटता जा रहा है और धीरे - धीरे इनकी आबादी में भी गिरावट हो रही है । एक समय ऐसा आएगा जब ये पूर्ण तरह से भारत में आना बंद हो जाएंगे और तब हमें पेलिकन पक्षी भी देखने को नहीं मिलेगा । चाहे वो कोई सा भी पक्षी हो मगर हमें इनको सुरक्षित रखने का कर्तव्य है । ये हमारी जैव - विविधता जेसी प्रकरण में अपनी सहभागिता देते है और कुदरत के नियम का पालन करते है । मगर कही न कही मानव कुदरत के नियम का पालन न करके इसके खिलाफ जा रहा है ।

हालही ही में 5G नेटवर्क लाने के लालच में रेडियो फ्रेकेवंसी तरंगों को पैदा करके कई पक्षियों की बलि दे रहा है । मगर अच्छी बात ये रही कि अभी भी कुछ लोगो में इंसानियत बची है जिन्होंने इस कृतघ्न के खिलाफ होकर पक्षियों के प्रति अपने प्रेम को दिखाया है । आप भी आपके आस पास पक्षियों को मारने और क्षति पहचाने वाले का विरोध कीजिए । और जरूरत पड़ने पर वन्य जीव बचाव दल को संपर्क कर अपना दायित्व दे ।



  मानव सभ्यता निरंतर विकसित और सक्षम होती जा रही है , आज मानव ने कई बेमिसाल अविष्कार कर दिखाए है और कई रहस्यों से पर्दा उठा दिया है। विकास क...

उपेक्षित पादप - Anmol guno vale plants

 


मानव सभ्यता निरंतर विकसित और सक्षम होती जा रही है , आज मानव ने कई बेमिसाल अविष्कार कर दिखाए है और कई रहस्यों से पर्दा उठा दिया है। विकास की इसी कड़ी में वैज्ञानिकों ने पेड़ - पौधो की दुनिया से कई जानकारियां प्राप्त की है । वैज्ञानिकों ने पेड़ - पौधो पर अवलोकन किए और कई निरक्षण की बदौलत आज हम पेड़ - पौधो के जगत से इतने वाकिफ है । मुनष्य ने इनसे ओषधियां , खाद्य पदार्थ , निवास , वस्त्र - वसन और हमारी दैनिक जीवन में उपयोगी अनेक सुविधाओ का प्राप्त किया है । पूरे विश्व में पांच हजार करोड़ से अधिक पादप प्रजातियां पाई जाती है जिनमे से हम 15 % प्रजातियों से ही परिचित है । अब आप अंदाजा लगा सकते है की इस विशाल पादप जगत को हम कितना जानते है और कितना जानना अभी शेष है । आज की चिकत्सा क्षेत्र में इन पेड़ - पौधो ने जमकर अपनी सहभागिता दी है जिसकी बदौलत हमारी चिकत्सा सुविधा इतनी सफल और कारगर सिद्ध हुई है । हम जिन ओंषधियो को बड़ी रकम देकर प्रांत करते है वो हमारे प्रकृति में मुफ्त उपलब्ध है । हमारे पास पेड़ - पौधो की उपलब्धता है मगर उसके सही ज्ञान का अभाव है । प्राचीन समय में वैद्य थे आज चिक्तसक  है उपचार नहीं बदला बस उपचार करने का तरीका बदल गया है । आज भी कई औषधीय - जानकार कई रोगों का उपचार आयुर्वेदिक तरीके से कर लेते है । हमारे पूर्वजों ने भी कई पेड़ - पौधो से कई बीमारियों का समाधान बताए है मगर आधुनिकता के प्रभाव में कही न कही हम पुराने तौर - तरीकों को भूलते जा रहे है । आज हम इसी प्रकार के कुछ पारंपरिक पेड़ - पौधो को जानेंगे जिनकी उपयोगिता धीरे - धीरे कम होती जा रही है । 

कुछ अंजान कुछ जाने पहचाने पेड़ - पौधे -


 ● सूरन : Amorphophallus 


वर्गीकरण ( classification ) ~ सूरन को भारत में इन कुछ प्रचलित नामों से पहचाना जाता हैं । जमीनकंद , डंडा , कुन्दा , दाना ( डूडा ) इत्यादि । सूरन प्लांटी जगत के अरेसी ( araceae ) कुल  का पौधा है । 


डूडा


उत्पत्ति ( Origin ) ~ अफ्रीका के पश्चिमी भाग में इसका जन्म हुआ मगर इसकी पूर्णतः खोज सयंक्त राज्य अमेरिका में हुई । वर्तमान में इसका वितरण एशिया , ऑस्ट्रेलिया और विभिन्न समद्रिय द्वीपों पर देखा जा सकता है । 



उपयोग ( Uses ) ~ सूरन जहरीले पेड़ - पौधो की गिनती में आता है । इसके कंद ( corm ) में टॉक्सिक एसिड की प्रचुरता होती है । इसको सेवन के लिए तैयार करने के से पहले इसमें उपस्थित जहरीले रसायनों को सावधानी पूर्वक निकालना पड़ता है अन्यथा इसके साइड इफेक्ट बहुत घातक भी हो जाते है । इसके कंदो ( corms ) में कैल्शियम ऑक्सिलेट क्रिस्टल पाया जाता है यही कारण से इसका सेवन करना लोग पसंद करते है । कई बार जानवर इनको चारे के साथ धोखे से खा लेते है जिस वजह से गले में सूजन आजाती है और अन्य पाचन समस्याएं उत्पन्न हो जाती है । इसकी ऊंचाई एक सामान्य पौधे की तुलना में अधिक होती है । 


 ● प्याजी : Indian Squill 

प्याजी

वर्गीकरण ( classification ) ~ जंगली प्याजी या प्याजी को मुख्यतः खरपतवारो की श्रेणी में रखा जाता है । प्लांटि जगत का ये पौधा सोलेनसी (solanaceae) कुल के अंतर्गत आता है । जिसे प्याज का जंगली रूपांतरण कहा जाता है , यह एक कंदीय पोधा है  ।



उत्पत्ति ( Origin ) ~ इसका जन्म सर्वप्रथम मिस्र ( Egypt ) देश में हुआ था । यह खरपतवार गेंहू और मटर की प्रजातियों के फसलों में उगता है । प्याजी का कंद ( bulb ) एक प्याज के कंद की तुलना में छोटा होता है । यह दिखने में हुबहू प्याज के समान दिखाई देता है मगर अम्लो की अधिकता के कारण इसका स्वाद तेज होता है । 


उपयोग ( Uses ) ~ प्याजी को मुख्यतः खाद्य पदार्थ के रूप में सेवन किया जाता है । इसके कंदो को सावधानी से साफ कर गर्म पानी में उबाला जाता है फिर उसकी सब्जी बनाई जाती है ।इसकी शाखाओं को भी इसी तरह साफ कर रसायनों को हटाकर भाजी बनाकर खाया जाता है । इसकी पत्तियों के रस में तरलीय पदार्थ बहुत तेज खुजलन पैदा करता है । प्याजी के पर्याप्त सेवन से पेट में अम्ल और क्षार के अनुपात को संतुलित रखती है । प्याजी की ओसतन ऊंचाई 15 से 30 सेमी तक होती है और चौड़ाई 25 से 35 सेमी तक पाई जाती है ।


 ● चकुंदा : Senna Obtusifolia 


वर्गीकरण ( classification ) ~ Senna Obtusifolia  भारत में पनवार , चकवात और पुवाड़ के नाम से प्रचलित है । चकुंदा प्लांटी जगत का फेबियासी ( fabaceae ) कुल और सेन्ना वंश का पौधा है । 


उत्पत्ति ( Origin ) ~ इस पौधे की उत्पत्ति चीन ( china ) से मानी जाती है । कहा जाता है सर्वप्रथम इसके बीजों का इस्तेमाल चीन के लोगो ने प्याले के तौर किया करते थे । और यही वो दौर  था जहा से चाय पीने की प्रथा भी प्रारंभ हो गई । चाय का अविष्कार भी चीन में ही हुआ मगर बादमें ये चाय भारत की परंपरा बन गई । चकुंदा के बीजों के प्याले की प्रथा आज भी भारत के कुछ गिने चुने गावों में कायम है । 




उपयोग ( Uses ) ~ यह पौधा 1.5 मीटर से 2.5 मीटर तक की ऊंचाई में पाया जाता है । चकुंदा के बीजों में प्रचुर मात्रा में विटामिन्स पाए जाते है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बड़ा देते है । विटामिन " ए " की अधिकता होने की वजह से आंखों की देखभाल और घुटनो के दर्द में रामबन सिद्ध होता है । चकुंदा की आज भी मार्केट में कई सारी मेडिसिन उपलब्ध है । इनके पीले फूलों का काढ़ा भी बनाया जाता है जो पाचन क्रिया को सुचारू बनाए रखने में सहायक होता  है ।



 ● कमचत्का लीली : Fritillaria Comschatcenssis 


वर्गीकरण ( classification ) ~ कमचटका या कमचत्का लीली प्लांटी जगत का लिलेयसी ( liliaceae ) कुल और फ्रिटिलारिया वंश का पादप है ।


उत्पत्ति ( Origin ) ~ लीली को सर्वप्रथम दक्षिण अमेरिका में खोजा गया था । लीली का एक समय में वितरण सम्पूर्ण एशिया महाद्वीप में हुआ करता था । मगर वर्तमान इसके फैलाव और उत्पादन में गिरावट आई है जिस वजह से इसका अभाव बढ़ता ही जा रहा है । जापान के कुछ क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर इसकी कृषि की जाती है । 



उपयोग ( Uses ) ~ कमचत्का लीली का अधिकांश प्रयोग बागवानियो और उद्यानों में गृह-वाटिका ( kitchen gardening ) में किया जाता है । इसके अलावा लीली के फूलों से इत्र भी तैयार किया जाता है । इसका तना लचीला और मज़बूत होने की वजह से कुछ लोगो द्वारा इसकी रस्सिया भी तैयार की जाती है ।  इसके पत्तियों का उगने का ढंग इतने बेहतरीन होता है की इसकी सुंदरता देखने लायक होती है । यह पौधा भी दूसरे पौधो की तुलना में ऊंचा और पतला होता है । 


 ● राजाक : Humulus Japanese Hop. 


वर्गीकरण ( classification ) ~ हमुलुस बेलीय पौधा होता है जिसे आमतौर पर पेड़ों पर लटका हुआ देखा जा सकता है । यह प्लांटी जगत का कन्नाबियासी ( cannabaceae ) कुल का पौधा है । 

राजाक


उत्पत्ति ( Origin ) ~ राजक वंश के इस पौधे का पता सन् 1880 में सयंक्त राज्य अमेरिका लगाया गया था । इसकी कुछ प्रजातियों का आकार इतना बड़ा होता है वो 300 किलो ग्राम तक का वजन आराम से झेल लेते है । भारत के कुछ गिने चुने जगहों पर ही उगता है जिनमे मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के तटवर्ती पहाड़ मुख्य है । 


उपयोग ( Uses ) ~ इसका मुख्य रूप से एल्कोहलिक पदार्थ तैयार करने में प्रयोग किया जाता है । बीयर जेसी शराब में इसका प्रयोग संरक्षण करने और सुंगध बड़ाने के लिए किया जाता है । राजक के पौधे में दो प्रकार के फूल पाए जाते है नर और मादा । दोनो फूलों में काफी विभिंताएं पाई जाती है और नर फूलों की समय अवधि मादा फूलों की तुलना में अधिक होती है । इसकी अनुकूलता बरसात ऋतु से शुरू होकर शरद ऋतु में जाकर खत्म हो जाती है । इसके बीज एक लम्बे अरसे तक सक्रिय रह सकते है । राजक के औषधीय गुण का इस्तेमाल मानसिक तनाव जेसे विकार को दूर करने में किया जाता है । 


उम्मीद करते है आपको ये रिपोर्ट काफी लाभकारी रही होंगी इन तमाम पौधो की जानकारी कुछ किताबो और अनुभवी लोगो से ली गई है । लिस्ट में और भी पौधे थे मगर हमने कुछ ही की जानकारी दी है । आपको इनमे से कॉन - कॉन से पौधो के बारे में पहले से पता था या नहीं, आप कॉमेंट बॉक्स द्वारा अपने विचार हमसे साझा कर सकते है । 


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