AutorRTJD Incognita Island

 आए दिन वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष एजेंसियों ने कुछ न कुछ उपलब्धियां हासिल किया करते है । मानवता का विकास तीव्रता से हो रहा है और यही मसला है ज...

नासा ने खोजा नया ग्रह new earth in space

 आए दिन वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष एजेंसियों ने कुछ न कुछ उपलब्धियां हासिल किया करते है । मानवता का विकास तीव्रता से हो रहा है और यही मसला है जो एक दिन भविष्य में हमे नए घर कहने का मतलब नए ग्रह की जरूरत पड़ने वाली है । नासा जेसी उत्कृष्ट अंतरिक्ष संस्था निरंतर इसी समस्या का हल ढूंढने में लगी हुई है ।


यहां तक उन्होंने 2031 तक साधारण मनुष्य की यात्रा को भी सफलतापूर्वक कराने का दावा किया है । और ये बात कुछ हद तक सही भी लगती है क्योंकि इससे पहले भी नासा ने कई असंभव मिशन को अंजाम दिया है । और इसी कड़ी में अब नासा ने बहुत ही बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है नासा के वैज्ञानिको ने 13,000 प्रकाश वर्ष दूर एक नए जमे हुए ग्रह का पता लगा लिया है जिसका द्रव्यमान पृथ्वी के समीम ही है । इस प्लेनेट की खोज से हमारे ग्रह के इतर दूसरी तरह की ग्रहीय व्यवस्थाओं को समझने में मदद मिलेंगी । शोधकर्ताओं की मानी तो ये ग्रह फिलहाल में बहुत ठंडा है जिस कारण इस वक्त वहा मनुष्य के रहने लायक वातावरण नही है । मगर भविष्य में वहा एक अनुकूल वातावरण की घनिष्ट आसार देखे जा सकेंगे । इसके अत्यधिक ठंडे होने के पीछे इसके तारे का बेहद निस्तेज होना है । संयुक्त राज्य अमेरिका
 में नासा की जेट प्रोपल्सन लैबोरेटरी के योसी श्वाटॉर्चवाल्ड ने कहा है " माइक्रोलेंसिंग के जरिए खोजा गया ' आइसबॉल ' सबसे कम द्रव्यमान वाला ग्रह है  । " आपको बता दे कि माइक्रोलेंसिंग एक ऐसी तकनीक होती है जो पृष्ठभूमि के तारो का प्रयोग फ्लैशलाइट के तौर पर करके सुदारवर्ती चीजों की खोज की सुविधा प्रदान करती हैं ।      

इन्ही सभी संकेतो से एक बात तो साफ नजर आती है की नासा " आईसबॉल " पर जीवन बसाने की फिराक में है । अभी तक नासा ने इस खोज से संबंधित कई पहलुओं को गुप्त ही रखा है । और इसके बारे में कोई आधिकारिक सूचना भी नही दी है वो इस मिशन को लोगो से छुपाकर काम कर रहे है । 


 कुछ दिन पहले ही ऐसी है खबर आई थी की नासा ने पृथ्वी के चारो ओर मानव निर्मित अवरोधक का पता लगाया है । नासा के अनुसंधान के द्वारा पृथ्वी के बाहरी आवरण में मानवनिर्मित अवरोधक का पता चला है जो उच्च ऊर्जा वाले अंतरिक्ष विकिरण के अनुसंधान के द्वारा पृथ्वी के बाहरी आवरण में मानवनिर्मित को ग्रह पर आने से बाधित करता है । मनुष्य लंबे अरसे से पृथ्वी के भू-परिदृश्य का आकर निश्चित करने का प्रयत्न करता आ रहा है । और अब तमाम प्रयासों के बाद वेज्ञानिको ने ये पाया की हम अपने निकटवर्ती अंतरिक्ष पर्यावरण का भी मापन करने में सक्षम है । अनुसंधान के द्वारा एक विशेष प्रकार की संचार व्यवस्था - बहुत कम आवर्ती वाली रेडियो संचार - व्यवस्था को अंतरिक्ष के कणों को प्रभावित करते हुए देखा गया । इस वजह से कणों के स्थान में परिवर्तन की क्रिया प्रभावित होती है । कई दफा ये परस्पर प्रक्रिया अंतरिक्ष की उच्च ऊर्जा वाले विकिरण के विरुद्ध पृथ्वी की चारो ओर एक अवरोधक बना लेती है । इस अनुसंधान का का प्रकाशन ' स्पेस साइंस रिव्यू '( space science review ) ' जर्नल में हुआ था ।




मनुष्य ने जितना विकास धरती पर किया है भविष्य में उतना ही विकास अंतरिक्ष में देखने को मिलेगा । और ये कड़वा सच भी है की मनुष्य ने जितनी गंदगी धरती पर फैलाई है उतना ही प्रदूषण वो अंतरिक्ष में भी करेगा । माना की नए खोजो और अविष्कारों से उन्नति होती है मगर ऐसी उन्नति किस काम की जिसके बदले हमे अपने अस्तित्व को क्षति पहुचाते हैं । आज नासा विश्व की उत्कृष्ट अंतरिक्ष संस्था मानी जाती है । मगर उनकी सफलताओं के पीछे उन्होंने भी कई जनहानि को क्षति पहचाई और कुदरत का उत्खनन किया है । नासा उन्ही खबरों को सार्वजनिक करती है जो उनके काम के बारे में होती है उनको नही जो उनकी खामियां पता चले । क्या मेरे इस विचार से आप भी सहमत है ? नहीं तो क्यों ? जो भी आपको सही लगे हमे अपने विचार साझा करे । 

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 टेक्नोलॉजी आधुनिक जगत की रीड की हड्डी ( Backbone ) हैं तो इंटरनेट इसका हृदय हैं । टेक्नोलॉजी नितांत इंप्रूव होती जा रहीं है और नए - नए फीचर...

जीपीएस तकनीक - GPS technology kya hai

 टेक्नोलॉजी आधुनिक जगत की रीड की हड्डी ( Backbone ) हैं तो इंटरनेट इसका हृदय हैं । टेक्नोलॉजी नितांत इंप्रूव होती जा रहीं है और नए - नए फीचर्स अपडेट हो रहे है । Google का एक बहुत ही खास फीचर है GPS तकनीक ।  हम जब भी कोई सॉफ्टवेयर को ओपन करते है तो हमे  लोकेशन की अनुमति देने के लिए GPS SYSTEM को ऑन करना पड़ता है । ये GPS SYSTEM हर एक मोबाइल , लैपटॉप और कंप्यूटर में उपलब्ध होता है । आइए अब हम इस GPS तकनीक को जानते है और हमारे जीवन में इसकी भूमिका को देखते है ।


GPS क्या होता हैं ? 

GPS का फुल फॉर्म है Global Positioning System ( वैश्विक स्थिति प्रणाली ) होता हैं । GPS एक Global Navigation satellite ( वैश्विक पथ प्रदर्शन उपग्रह ) सिस्टम है । जो किसी भी जगह की स्थिति का लोकेशन बताता है । 


इस GPS का इस्तेमाल सर्वप्रथम सन् 1960 में अमेरिकी Defence Department ( रक्षा विभाग ) ने किया था ।  शुरुवाती दिनों में इस तकनीकी का प्रयोग मिलिट्री और आर्मी में किया जाता था बाद में GPS सार्वत्रिक रूप से किया जाने लगा ।  GPS का कनेक्शन सीधा सैटेलाइट से जुड़ा होता है जो वहा से सिग्नल भेजता रहता है और इन सिग्नल को रिसीव करने के लिए उपकरण बनाए जाते है । हम जो सेल फोन इस्तेमाल करते है वहा जो सिग्नल आता वो 4 से 5 सैटेलाइट की सहायता से आता  है । और इसी कारण हम किसी भी नेटवर्क यूजर का लोकेशन इतनी आसानी से लगा  पाते है । GPS एक इंटरनल सिस्टम है जिसकी लिंक सैटेलाइट में इंस्टॉल्ड होने के माध्यम से हम लोकेशन देख पाते है । इसके अलावा GPS से हम दुरी ( Distance ) , गति ( Speed ) और मानचित्र ( Map ) भी प्रदान करता है । 



GPS की कार्य प्रणाली ~

जेसे की मैं पहले ही बता चुका हूँ GPS एक Internal System हैं जो रिसिवर ओर सॅटॅलाइट के बीच एक माध्यम के रूप में कार्य करता हैं । जब सॅटॅलाइट कोई सिग्नल भेजता हैं तो मोबाइल रिसीवर का काम करता है । हर वो मोबाइल जिसमे नेटवर्क आता है वो किसी नजदीकी सॅटॅलाइट से जुड़ा हुआ होता है और जब हमारे मोबाइल में सिग्नल आत्ता है तो वो हमारे मोबाइल की लोकेशन ओर अन्य जानकारियां सॅटॅलाइट को दे देता है । GPS का ज़्यादातर उपयोग ट्रांस्पोर्टिसम की दुनिया मे होता हैं । यात्रि अपन रास्ता ढूंढने ओर किसी टूर पॉइंट का पता आदि GPS की सहायता से कर पाते है । जब कोई ड्राइवर अपना रास्ता भटक जाता है तो वो सबसे पहले मोबाइल निकालकर गूगल पर या मैप में जाकर अपना लोकेशन देखता है । मैप Google का ही एक हिस्सा है जो GPS का इस्तेमाल कर लोकेशन्स बताता रहता है । सॅटॅलाइट किसी जगह को बार बार सर्च करने पर उसका लॉकेशन सेव कर लेता है और उसकी स्थिति को मुख्य स्पॉट बना देता है । किसी एक ही जगह से जितने अधिक GPS ऑन किये जाते है लॉकेशन मिलते है वहां सॅटॅलाइट उपग्रडेशन का काम अधिक करता है । मैप पर जो लाइव पिक्चर दिखाई देती है वो असल मे live या stream न होकर नविगटेड 3D Visualization का कमाल होता है । 



  सौरमंडल में सौर परिवार का सबसे बड़ा ग्रह और सबसे भारी ग्रह बृहस्पति है इसका वजन दूसरे ग्रहों की तुलना में 2.5 गुना अधिक भारी है।

बृहस्पति : Jupiter The biggest Planet in Solar Family

 


सौरमंडल में सौर परिवार का सबसे बड़ा ग्रह और सबसे भारी ग्रह बृहस्पति है इसका वजन दूसरे ग्रहों की तुलना में 2.5 गुना अधिक भारी है।

 समुद्र में पाए जाने वाले प्राणियों में सबसे मुख्य मछलियां ही आती है । और इसलिए भी समुद्र की रानी मछली को कहा जाता है । आज तक हमने समद्र में...

बुद्धिजीव सी-लॉयन - Difference Between Seal And Sea-Lion

 समुद्र में पाए जाने वाले प्राणियों में सबसे मुख्य मछलियां ही आती है । और इसलिए भी समुद्र की रानी मछली को कहा जाता है । आज तक हमने समद्र में सिर्फ तैरने वाले जीवों से तो परिचित है मगर आज हम जमीन पर रेंगने और चलने वाले जीव के बारे में बात करेंगे । हम सब ये तो जानते है की जंगल का राजा शेर को कहा जाता है । मगर हम अब बात करने जा रहे है समुद्र के शेर के बारे में , आप जिस तरह जंगल के खूंखार शेर को जानते है ये इसके एक दम विपरीत प्राणी है । 

सी~लाईन


सील ( Seal ) , सी-लॉयन ( Sea-Lion ) और वालरस एनिमल पिनेपेड्स ( Pinnipeds ) के रूप में पाए जाते है । पिनिपेड का मतलब ऐसे जीवों से होता है जो थल और जल दोनो आवरण में चल फिर सकते है ।  सील और सी-लॉयन ( जलव्याघ्र ) में कुछ बड़े अंतर है जेसे की सी-लॉयन अपने चारो पट्टिका ( फ्लिपर्स ) का इस्तेमाल कर जमीन पर भी चल सकता है जबकि सील अपने पीछे के हिस्से का सहरा लेकर छलांग लगाकर चलता है । सी-लॉयन दिखने में भालू जैसा लगता है जबकि सील चिकनी चमड़ी वाला व्हेल जैसा दिखता है । नर सी-लॉयन का वजन लगभग 363 किलोग्राम तक होता है और उसकी ऊंचाई 9 फीट के आस पास होती है । जबकि मादा सी-लॉयन का वजन 181 किलोग्राम और ऊंचाई यही कही 6 फीट के आस पास होती है । ये इतना भरकम शरीर लेकर भी पानी में आसानी से तैर लेता है । यह 40 किलोमीटर प्रति घंटे की तेज रफ्तार से पानी को चीरता हुआ तैर लेता है । इसके कान तो होते है मगर आकर में बहुत छोटे जिस वजह से उनमें पानी नहीं घुस पाता है ।  इतना ही नहीं सी-लॉयन अपने शिकार के लिए लम्बे - लम्बे गोते भी आसानी से लगा लेता है । ये अधिकतम 900 फीट  की ऊंचाई तक गोता लगा सकता है ।  मगर ये शिकार के लिए समुद्र के अधिक गहराई में नही जाता क्योंकि वहा इनकी जान को शार्क जेसे खूंखार समुद्री जीवो से खतरा होता है । कहा जाता है बुद्धिमान जीवों की सूची में डॉल्फिन का नाम भी लिया जाता है । और हमारे जलव्याघ्र भी डॉल्फिन की तरह समझदार और चतुरता का उधारण माना जाता है । सी-लॉयन के शरीर पर बाल भी मौजूद होते है ये बाल बारीक तो होते है मगर इनकी मोटाई होने के कारण पानी में तैरने में सहयाता मिलती है । इनके चार फ्लिपर्स पानी और जमीन पर दोनो जगह काम करते है और यही विशेषता इस जीव को अन्य जीवो से अलग करती है । सी-लॉयन  का सामान्यतः गहरा भूरा रंग होता है और गोल - मोटल शरीर संरचना होती है । 



पूरे विश्व में सी-लॉयन की कुल 7 प्रजातियां पाई जाती है जिसमे से स्टेलर प्रजाती आकर में सबसे बड़ी होती है । ये पूरी दुनिया के समुद्रीय तटो पर मिल जाएंगे सिवाय उत्तरी अटलांटिक महासागर को छोड़कर । इनको ज्यादातर झुंड में देखा जासकता है क्योंकि इसको समूह में रहना पसंद है और ये सुरक्षित भी रहता है । सी-लॉयन को स्तनधारी प्राणियों की श्रेणी में रखा गया है । ये अन्य जीवो की तरह जमीन पर बच्चे देते हैं जिनका प्रारंभिक वजन 7 किलोग्राम तक होता है । इनके बच्चे चलने से पहले पानी में तैरना सीख जाता है । ये दिखने में बहुत ही मासूम और शांत स्वभाव का जीव लगता है , मगर जब इसके शिकार करने का वक्त होता है तो ये ऑक्टोपस जेसे खतरनाक समद्रीय जानवर को भी अपने शिकंजे में कर लेता है । इनका साधारण भोजन तो छोटी - छोटी मछलियां होती है मगर कभी कभार ये झुंड में हमला कर बड़े जीवो का भी शिकार कर लेते है । सी-लॉयन पानी में 20 मिनट तक अपनी सांस रोक कर तैर सकता है और खतरा महसूस होने पर यह मरने का ढोंग भी बड़ी चतुरता से कर लेता है । यह शयाना तो है ही साथ में खूंखार भी है इसलिए इसे समद्रु का शेर भी कहा जाता है । 


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 आज तक आपने कितने पक्षि देखे होंगे ? अनगिनत , जिसकी कोई गिनती नहीं है न ? चाहे वो आसमान में उड़ने वाले पक्षी हो या पालतू पक्षी या फिर जंगल औ...

पेलिकन Lambi Chonche Vaala Bird

 आज तक आपने कितने पक्षि देखे होंगे ? अनगिनत , जिसकी कोई गिनती नहीं है न ? चाहे वो आसमान में उड़ने वाले पक्षी हो या पालतू पक्षी या फिर जंगल और चिड़ियाघर वाले होंगे ! कोई पक्षी उसके मधुर आवाज से आपको मनमोहित किया होगा तो कईयो ने अपनी तेज उड़ान के कारण हैरान किया होगा या फिर किसी पक्षी की मासूमियत ने आपको पागल किया होगा । मगर आज हम जिस पक्षी की बात करने वाले है वो इन सबसे अलग और हटके है थोड़ा । जो अपनी लंबी चोंच के चलते दुनिया भर में चर्चित है । इसको आपने कई दफा दे


खा भी होंगा मगर आपको उस वक्त इसका नाम नही पता होंगा या याद नही आ रहा होंगा । मगर आज इसके बारे में पढ़ने के बाद आप इसे जहा भी देखेंगे तो समझ जायेंगे यह वही पक्षी है । यह पेलीकन ( Pelican )  पक्षी है जो बगुले और बतख का मिलता - जुलता स्वरूप है । आप इसे पानी में डुबकियां लगाते या किनारे पर गोते लगाते देख सकते है । पेलिकन कई रंगों में पाए जाते है पर सफेद और गुलाबी रंगो में इनको ज्यादातर देखा जाता है । ये आमतौर पर पानी की किनारे तिनके या मिट्टी के घोंसले बनकर रहते है । यह एक प्रवासी पक्षी है जो साइबेरिया और यूरोप से हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर भारत में आते है । पेलिकन पक्षी मुख्यताः भारत के पश्चिमी क्षेत्र में निवास करते है , गुजरात और महाराष्ट्र की सीमाओं पर इनको भरी संख्या में देखा जा सकता है । नवंबर से दिसम्बर तक इनका आगमन भारत में शुरू हो जाता है । ये हमेशा झुंड में ही रहना पसंद करते है जिस वजह से इनके घोसलो की संख्या बड़े तादाद में एक साथ होती है ।

  मादा पेलिकन 2 से 3 अंडे देती है और इनके चूजों का पालन - पोषण दोनो पक्षी मिलकर करते है । इनके घोंसले जमीन पर घास और मिट्टी में होने कारण जंगली जानवरों से खतरा बना रहता है , कई बार इनके अंडो को कुत्ते और लोमड़ी जेसे जानवर खा भी जाते है । नर पेलिकन का ओसत वजन 9 से 12  किलो ग्राम के बीच होता है इतने भारी भरकम पक्षी होने के बावजूद इनकी उड़ने की रफ्तार बहुत ही तेज होती है । इसके अलावा इन पक्षियों को समद्रीय पक्षियों में सबसे विशाल पक्षियों का दर्जा भी दिया गया है । पेलिकन पक्षियों को अक्सर साफ वातावरण में देखा गया है इसलिए इनको इतना ज्यादा लोग भी पसंद करते है । इनको भी आम मनुष्य को तरह गन्दगी और प्रदूषण बिलकुल भी पसंद नही है । पेलिकन पक्षियों का शिकार झीलों और नदियों , तालाब में रहने वाली मछलियां होती है । ये अपनी लंबी तिकोनी चोंच से पानी को चीरते हुए अपना शिकार करती है और ये नजरा देख हर कोई इस पक्षी की चतुराई की वाह - वाही करने लगता है ।

इनकी एक मुख्य विशेषता होती है , आपने रेगिस्तान के ऊट के बारे में सुना होंगा जो अपने कुब्बड़ लंबे समय तक पानी संचय करके रखता है । उसी तरह पेलिकन के गले में एक थेलीनुमा अवस्था होती है जहा ये पर्याप्त मात्रा में पानी और भोजन को संचित करके रखा लेते है और लंबे समय तक जमीन पर उतरे बिना अपना सफर जारी रखते है मगर भारत की नदियों और झीलों में बढ़ती गन्दगी और प्रदूषित जल के कारण पेलीकन पक्षियों का भारत में आवास घटता जा रहा है और धीरे - धीरे इनकी आबादी में भी गिरावट हो रही है । एक समय ऐसा आएगा जब ये पूर्ण तरह से भारत में आना बंद हो जाएंगे और तब हमें पेलिकन पक्षी भी देखने को नहीं मिलेगा । चाहे वो कोई सा भी पक्षी हो मगर हमें इनको सुरक्षित रखने का कर्तव्य है । ये हमारी जैव - विविधता जेसी प्रकरण में अपनी सहभागिता देते है और कुदरत के नियम का पालन करते है । मगर कही न कही मानव कुदरत के नियम का पालन न करके इसके खिलाफ जा रहा है ।

हालही ही में 5G नेटवर्क लाने के लालच में रेडियो फ्रेकेवंसी तरंगों को पैदा करके कई पक्षियों की बलि दे रहा है । मगर अच्छी बात ये रही कि अभी भी कुछ लोगो में इंसानियत बची है जिन्होंने इस कृतघ्न के खिलाफ होकर पक्षियों के प्रति अपने प्रेम को दिखाया है । आप भी आपके आस पास पक्षियों को मारने और क्षति पहचाने वाले का विरोध कीजिए । और जरूरत पड़ने पर वन्य जीव बचाव दल को संपर्क कर अपना दायित्व दे ।



  टाइफून , भवंडर या चक्रवात और ट्रॉपिकल स्टॉर्म : समुद्रीय सतह (surface) पर तीव्रता (intensity) से तापमान (temperature) की आवर्ती ( frequenc...

🌀 Typhoon kya hai - What is it Hurricane Cyclone and Thunderstorm

 टाइफून , भवंडर या चक्रवात और ट्रॉपिकल स्टॉर्म :


समुद्रीय सतह (surface) पर तीव्रता (intensity) से तापमान (temperature) की आवर्ती ( frequency) में आए परिवर्तन से उत्पन्न आकस्मिक तूफान या आंधी को टाइफून का नाम दिया गया है । इसे क्षेत्र और भाषा के अनुसार अलग - अलग नाम से पहचाना जाता है । ट्रॉपिकल स्टॉर्म , चक्रवात ,भवंडर एक ही परिस्थिति के पहलू है जो समूद्र में असंतुलन के कारण जन्म लेते है । 

  जब भी अंतरिक्ष की बात की जाती है तो सर्वप्रथम हमारे ध्येय में सौरमंडल के 8 गृह का विचार आता ही है । आए भी क्यों नही हमने इनके बारे में बचप...

बर्फीले गैस दानव Arun and Varun Planets

 


जब भी अंतरिक्ष की बात की जाती है तो सर्वप्रथम हमारे ध्येय में सौरमंडल के 8 गृह का विचार आता ही है । आए भी क्यों नही हमने इनके बारे में बचपन से लेकर आज तक कुछ न कुछ जानते रहे है । मगर इनके बारे में जीतनी जानकारी मिले हमारे अंदर उतनी ही और उत्सुकता बड़ जाती है । हमने अभी तक सौरमंडल के गृह के बारे में जितनी जानकारी हासिल की है वो पूर्ण जानकारी नहीं है । इनमे से कुछ गृह ऐसे भी है जहा पर वैज्ञानिकों का पहुंचना भी असंभव है । अब आप समझ ही गए होंगे मैं किन गृहों की बात कर रहा हूं । इनको सौरमंडल के '  जुड़वा गृह 'और  ' बर्फीले गैस दानव ' आदि नामो से जाना जाता है । जी हां , आज हम बात करेंगे अरुण और वरुण गृहों के बारे में । यू तो इन गृहों के बारे में हमने काफी कुछ सुना हुआ है मगर इनकी यह जानकारी पर्याप्त नहीं है । समय - समय पर इनके रहस्यों से पर्दा उठता जाता है और हमे नई - नई बातो का खुलासा होता जाता हैं । 


अरुण ~ URANUS


हमारे सौरमंडल में सूर्य के इस आठ अनूठो के समूह में यह  सातवें नंबर का सदस्य है जिसे अंग्रेजी में यूरेनस कहते है । बाकी गृहों की तुलना में अरुण का तापमान बहुत ही कम है , सूर्य से दूर स्थिति के कारण ही इसका वातावरण इतना ठंडा है । अरुण का न्यूनतम तापमान  -49 Kelvin  केल्विन आका गया है जिसका °c में -244° सेंटीग्रेड होता है । इतने कम तापमान में किसी भी जीवाणु या विषाणु का सक्रिय रहना मुश्किल हो जाता है । पृथ्वी की तुलना में यह बहुत कम घना है जिस कारण से इसका घनत्व बहुत कम है क्योंकि अरुण पर गैसीय कणों की अधिकता पाई जाती है । अरुण गृह की खोज 13 मार्च 1781 में में एक खगोलशास्त्री विलियम हरशेल ने की थी । सौरमंडल में हमारी पृथ्वी से दूर होने के बावजूद इसे नंगी आंखो द्वारा भी देखा जा सकता है । हालाकि बिना दूरबीन से देखने पर यह एक तारे के समीप टिमटिमाता दिखाई देता है ।  यही कारण से प्राचीन समय में भी विद्वानों ने इसे टिमटिमाता बड़ा तारा ही समझते थे और इसको गृहों की सूची में शामिल नहीं करे थे ।  

अरुण से सम्बंधित जानकारी 

★ खोजकर्ता -   विलियम हरसोनेल [3 मार्च 1781]

★ उपनाम    -    युरानीयन

★ उपग्रह   -       27 

★ द्रव्यमान  -      8.681×10 ^ 25 किलोग्राम

★ परिक्रमण-      30,799 दिन / एक परिक्रमण सूर्य का 


सौरमंडल के चारो गृहों को गैसीय दानवों का दर्जा दिया गया है जिसमे से अरुण और वरुण दो मुख्य गृह माने जाते है । ये मिट्टी और पत्थर के न बने होकर गैसीय कणों के बने होते है और ये आकर में विशाल होने के कारण भद्दे दिखाई देते है जिस वजह से इनको दानव गृह कहा जाने लगा । इनकी वास्तविक सरंचना तो सीमित होती है मगर गैसीय आवरण या वलय काम ज्यादा होता रहता है । शनि और बृहस्पति की तुलना में अरुण और वरुण गृहों पर बर्फ की मात्रा काफी अधिक है साथ ही अमोनिया और मेथेन गैस की बर्फ भी मौजूद है । 


वरुण ~ NEPTUNE 


वरुण गृह जिसे अंग्रेजी में NEPTUNE PLANET भी कहा जाता है । सौरमंडल के आठ गृहों की श्रृंखला में सबसे आखरी गृह है वरुण , इसे सौरमंडल का सबसे ठंडा गृह भी कहा जाता है । एक ओसत तापमान भी इस गृह पर -214 °C होता है इसका तापमान स्थिर नहीं रहता है । 

वरुण ग्रह से सम्बंधित जानकारी 

★ खोजकर्ता - अर्बेन ले. वैरियर [23 सितम्बर 18]

★ उपनाम - नेप्टियन

★उपग्रह - 11

★ द्रव्यमान - 1.024× 10 वर्ग 26 किलोग्राम

★ परिक्रमण-   60,190 दिन और 3 घंटे 

पृथ्वी से कई प्रकाश वर्ष दूर स्थित होने के कारण इसे नंगी आंखो द्वारा देख पाना संभव नहीं है । इसकी सरंचना अरुण गृह से मिलती-जुलती है इसलिए दोनो में काफी समानताएं भी है । वरुण गृह सभी गृहों की तुलना में बहुत हल्का और कम घना है क्योंकि यह पूरी तरह गैसो से बना हुआ है और इसका यह आवरण हीलियम हाइड्रोजन और मैथन से ही निर्मित है । और मैथन गैस की अधिकता के चलते NEPTUNE PLANET गहरा नीले रंग का दिखाई देता है । इसका रंग समुद्र जैसा होने के कारण इसका नामकरण भी समुद्र के रोमन देवता के नाम पर हुआ है । सौरमंडल के आखरी क्षोर पर होने के कारण सूर्य का पैसिव फोर्स कम होता है इस पर इस वजह से यह बहुत तेज गति से घूमता है । इसकी तेज गति से घूमने के कारण वरुण गृह पर बहुत तेज हवाएं और ठंडे हवा के झोके चलते रहते है । वरुण गृह पर एक घना धब्बा है काले रंग जो हमारी पृथ्वी उतना बड़ा है जिसे  ' द ग्रेट डार्क स्पॉट ' ( The great dark spot ) नाम दिया गया है । जो अरुण गृह को और भी अन्य गृह से अलग  बना देता है । नेपच्यून गृह पर भी शनि गृह की तरह वलय ( Rings ) स्थित है मगर ये वलय इतने हल्के और बारीक है की इनको देख पाना मुश्किल होता है ।  ये वलय मुख्य रूप से  बर्फ के कणों  ( ice particle ) और कार्बन पदार्थ  ( carbon substances ) से निर्मित है ।